छायावादी युग में ब्रज भाषा का काव्य

छायावादी युग में कवियों का एक वर्ग ऐसा भी था जो सूर,तुलसी,सेनापति,बिहारी और घनानंद जैसी समर्थ प्रतिभा संपन्न काव्य-धारा को जीवित रखने के लिए ब्रज-भाषा में काव्य रचना कर रहे थे। भारतेंदु युग में जहां ब्रज भाषा का काव्य प्रचुर-मात्रा में लिखा गया वहीं छायावाद आते-आते ब्रज-भाषा में गौण रूप से काव्य रचना लिखी जाती रही। इन कवियों का मत था कि ब्रज-भाषा में काव्य की लंबी परम्परा ने उसे काव्य के अनुकूल बना दिया है। छायावादी युग में ब्रज भाषा में काव्य रचना करने वाले कवियों में रामनाथ जोतिसी,रामचंद्र शुक्ल,राय कृष्णदास,जगदंबाप्रसाद मिश्र 'हितैषी',दुलारे लाल भार्गव,वियोगी हरि,बालकृष्ण शर्मा 'नवीन',अनूप शर्मा,रामेश्वर 'करुण',किशोरीदास वाजपेयी,उमाशंकर वाजपेयी 'उमेश' प्रमुख हैं।

रामनाथ जोतिसी(1874-.......) की रचनाओं में 'रामचंद्रोदय' मुख्य है। इसमें रामकथा को युग के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है। इस काव्य पर केशव की 'रामचंद्रिका' का प्रभाव लक्षित होता है।विभिन्न छंदों का सफल प्रयोग हुआ है। 

रामचंद्र शुक्ल(1884-1940) जो मूलत: आलोचक थे, ने 'एडविन आर्नल्ड' के आख्यान काव्य लाइट आफ़ एशिया का 'बुद्धचरित' शीर्षक से भावानुवाद किया।शुक्ल जी की भाषा सरल और व्यवहारिक है।

राय कृष्णदास(1892-1980) कृत 'ब्रजरस', जगदम्बाप्रसाद मिश्र 'हितैषी'(1895-1956) द्वारा रचित कवित्त-सवैये और दुलारेलाल भार्गव की 'दुलारे-दोहावली' इस काल की प्रमुख व उल्लेखनीय रचनाएं हैं।

वियोगी हरि(1896-1988) की 'वीर सतसई' में राष्ट्रीय भावनाओं की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति हुई है। 

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' ने अनेक स्फुट रचनाएं लिखी। लेकिन इनका ब्रज भाषा का वैशिष्टय 'ऊर्म्मिला' महाकाव्य में लक्षित होता है,जहां इन्होंने उर्मिला का उज्ज्वल चरित्र-चित्रण किया है।

अनूप शर्मा (1900-1966) के चम्पू काव्य 'फेरि-मिलिबो'(1938)में कुरुक्षेत्र में राधा और कृष्ण के पुनर्मिलन का मार्मिक वर्णन है।

रामेश्वर 'करुण' (1900-.......)की 'करुण-सतसई'(1930) में करुणा,अनुभूति की तीव्रता और समस्यामूलक अनेक व्यंग्यों को देखा जा सकता है।

किशोरी दास वाजपेयी की 'तरंगिणी' में रचना की दृष्टि से प्राचीनता और नवीनता का सुंदर समन्वय देखा जा सकता है।

उमाशंकर वाजपेयी 'उमेश'(1907-1957) की रचनाओं में भी भाषा और संवेदना की दृष्टि से नवीनता दिखाई पड़ती है। 

इन रचनाओं में नवीनता और छायावादी काव्य की सूक्ष्मता प्रकट हुई है, यदि इस भाषा का काव्य परिमाण में अधिक होता तो यह काल ब्रजभाषा का छायावाद साबित होता।

टिप्पणियाँ

  1. ब्रजभूमि और प्रेम का अन्योनाश्रय सम्बन्ध है... इसलिए ब्रज भाषा की मिठास ही प्रेम की के रूप में जानी जाती है.. कम से कम मेरा तो यही मानना है... बचपन इसी भूमि की धूलि में बीता है इसलिए अनुभव है कि यहाँ समबन्धों की मधुरता की अभिव्यक्ति ह्रदय से अनुभव की जाने की बात है... विषयान्तर हो गया प्रतीत होता है.. यह परिचय श्रृंखला एक स्थान पर एक पूरे युग को प्रस्तुत करती है... साधुवाद!!

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  2. इस बून्द ने प्यास और जगा दी है। लगता है इस घड़ॆ को मुहं से लगा ही लेना चाहिये :)

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  3. आपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को नये साल की ढेर सारी शुभकामनायें !

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  4. प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट " जाके परदेशवा में भुलाई गईल राजा जी" पर आपके प्रतिक्रियाओं की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी । नव-वर्ष की मंगलमय एवं अशेष शुभकामनाओं के साथ ।

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