प्रयोगवादी कविता की प्रवृत्तियां

प्रयोगवादी कविता में मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रवृत्तियां देखी गई हैं:-

1. समसामयिक जीवन का यथार्थ चित्रण: प्रयोगवादी कविता की भाव-वस्तु समसामयिक वस्तुओं और व्यापारों से उपजी है। रिक्शों के भोंपू की आवाज,लाउड स्पीकर का चीत्कार,मशीन के अलार्म की चीख,रेल के इंजन की सीटी आदि की यथावत अभिव्यक्ति इस कविता में मिलेगी। नलिन विलोचन शर्मा ने बंसत वर्णन के प्रसंग में लाउड स्पीकर को अंकित किया। प्रत्युष-वर्णन में उन्होंने रिक्शों के भोंपू की आवाज का उल्लेख किया। एक अन्य स्थल पर रेल के इंजन की ध्वनि का उल्लेख हुआ। मदन वात्स्यायन ने कारखानों में चलने वाली मशीनों की ध्वनि का ज्यों का त्यों उल्लेख किया है। समसामयिकता के प्रति इनका इतना अधिक मोह है कि इन कवियों ने उपमान तथा बिम्बों का चयन भी समसामयिक युग के विभिन्न उपकरणों से किया है। भारत भूषण अग्रवाल ने लाउड स्पीकर तथा टाइपराइटर की की को उपमान के रूप प्रस्तुत किया। रघुवीर सहाय ने भी पहिये और सिनेमा की रील के उपमानों को ग्रहण किया है। केसरी कुमार ने व्यवसायिक जीवन के उपमानों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार चिकित्सा तथा रसायन-शास्त्र से अनेकों उपमान प्रयोगवादी कवियों ने ग्रहण किए हैं। गिरिजाकुमार माथुर की हब्श देश नामक कविता की निम्न पंक्तियां देखिए जिनमें औद्योगिक और रासायनिक युग को वाणी प्रदान की गई है:-
उगल रही हैं खानें सोना,
अभ्रक,तांबा,जस्त,क्रोनियम
टीन,कोयला,लौह,प्लेटिनम
युरेनियम,अनमोल रसायन
कोपेक,सिल्क,कपास,अन्न-धन
द्रव्य फोसफैटो से पूरित! 
2. घोर अहंनिष्ठ वैयक्तिकता:- प्रयोगवादी कवि समाज-चित्रण की अपेक्षा वैयक्तिक कुरूपता का प्रकाशन करके समाज के मध्यमवर्गीय मानव की दुर्बलता का प्रकाशन करता है। मन की नग्न एवं अश्लील वृत्तियों का चित्रण करता है। अपनी असामाजिक एवं अहंवादी प्रकृति के अनुरूप मानव जगत के लघु और क्षुद्र प्राणियों को काव्य में स्थान देता है। भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता की प्रतिष्ठा करता है। कवि के मन की स्थिति,अनुभूति,विचारधारा तथा मान्यता इस कविता में विशेष रूप से अभिव्यक्त हुई है। व्यक्ति का केवल सामाजिक अस्तित्व ही नहीं है,बल्कि उसकी अपनी भावनाओं का भी एक संसार है। इसलिए इस कविता में अधिक ईमानदारी के साथ कवि के निजी दर्द अभिव्यक्त हुए हैं।
 मेरी अंतरात्मा का यह उद्वेलन- 
 जो तुम्हें और तुम्हें और तुम्हें देखता है
 और अभिव्यक्ति के लिए तड़प उठता है-
 यही है मेरी स्थिति,यही मेरी शक्ति। 
 .....................
चलो उठें अब
अब तक हम थे बंधु
सैर को आए-
और रहे बैठे तो
लोग कहेंगे
धुंधले में दुबके दो प्रेमी बैठे हैं
वह हम हों भी
तो यह हरी घास ही जाने                          (अज्ञेय)
3. विद्रोह का स्वर: इस कविता में विद्रोह का स्वर एक ओर समाज और परम्परा से अलग होने के रूप में मिलता है और दूसरी ओर आत्मशक्ति के उद्-घोष रूप में। परम्परा और रूढ़ि से मुक्ति पाने के लिए भवानी प्रसाद मिश्र कहते हैं:-
ये किसी निश्चित नियम,क्रम की सरासर सीढ़ियां हैं
पांव रखकर बढ़ रहीं जिस पर कि अपनी पीढ़ियां हैं
बिना सीढ़ी के बढ़ेंगे तीर के जैसे बढ़ेंगे.
विद्रोह का दूसरा रूप चुनौती और ध्वंस की बलवती अभिव्यक्ति के रूप में मिलता है। भारत भूषण अग्रवाल में स्वयं का ज्ञान अधिक प्रबल हो उठा कि वे नियति को संघर्ष की चुनौती देते हुए कहते हैं:-
मैं छोड़कर पूजा
क्योंकि पूजा है पराजय का विनत स्वीकार-
बांधकर मुट्ठी तुझे ललकारता हूं
सुन रही है तू?
मैं खड़ा यहां तुझको पुकारता हूं।
आततायी सामाजिक परिवेश को चुनौती देते हुए अज्ञेय कहते हैं:
ठहर-ठहर आततायी! जरा सुन ले
मेरे क्रुद्ध वीर्य की पुकार आज सुन ले। 
वैज्ञानिक युग ने उसे पुराने चरित्रों के प्रति शंकित किया है,इसलिए वह उनके प्रति कोई श्रद्धा नहीं रखता। इस कविता के कवि को ईश्वर,नियति,मंदिर,दैवी-व्यक्तियों एवं स्थानों में विश्वास नहीं है। वह स्वर्ग और नरक का अस्तित्व नहीं मानता। भारत भूषण अग्रवाल की निम्न पंक्तियां देखिए-
रात मैंने एक स्वपन देखा
मैंने देखा
कि मेनका अस्पताल में नर्स हो गई
और विश्वामित्र ट्यूशन कर रहें हैं
उर्वशी ने डांस स्कूल खोल लिया है
गणेश टॉफ़ी खा रहे हैं
4. लघु मानव की प्रतिष्ठा: प्रयोगवादी काव्य में लघु मानव की ऐसी धारणा को स्थापित किया गया है जो इतिहास की गति को अप्रत्याशित मोड़ दे सकने की क्षमता रखता है; धर्मवीर भारती की ये पंक्तियां देखिए:-
मैं रथ का टूटा पहिया हूं
लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले
इस कविता में मानव के लघु व्यक्तित्व की उस शक्ति पर गौरव तथा अभिमान अभिव्यक्त हुआ है जो व्यक्ति की महत्ता की चरम सीमा का स्पर्श करती है।

5. अनास्थावादी तथा संशयात्मक स्वर: डॉ. शंभूनाथ चतुर्वेदी ने अनास्थामूलक प्रयोगवादी काव्य के दो पक्ष स्वीकार किए हैं। एक आस्था और अनास्था की द्वंद्वमयी अभिव्यक्ति,जो वस्तुत: निराशा और संशयात्मक दृष्टिकोण का संकेत करती है। दूसरी,नितांत हताशापूर्ण मनोवृत्ति की अभिव्यक्ति।
कुंठा एक अनास्थामूलक वृत्ति है। प्रयोगवादी कवि अपनी कुंठाओं और वासनाओं को छिपाने में विश्वास नहीं रखता,इसलिए वह इनका नग्न रूप प्रस्तुत कर देता है। धर्मवीर भारती की निम्नांकित की पंक्तियां देखिए:
अपनी कुंठाओं की
दीवारों में बंदी
मैं घुटता हूं
प्रयोगवादी कविता में पस्ती,पराजय और अविश्वास की अभिव्यक्ति के रूप में भी अनास्था को प्रमुख स्थान मिला है। विजयदेव नारायण साही ने भी व्यक्ति या समाज को आक्रांत करने वाली अनास्था का भी स्पष्ट प्रकाशन किया है,और संपूर्ण समाज अथवा व्यक्ति विशेष से अनास्था के तत्वों को ग्रहण करने का भी संदेश दिया है-
हर आंसू कायरता की खीझ नहीं होता
बाहर आओ
सब साथ मिलकर रोओ

6. आस्था तथा भविष्य के प्रति विश्वास:  जहां प्रयोगवाद के कुछ कवियों ने अनास्थावादी और संशयात्मकता को स्वर दिए वहीं कुछ अन्य कवियों ने जैसे नरेश मेहता तथा रघुवीर सहाय ने काव्य में अनास्थामूलक तत्वों को अनावश्यक पाया। गिरिजाकुमार माथुर के काव्य में आस्था के बल पर नव-निर्माण का स्वर मुखरित हुआ है। हरिनारायण व्यास तथा नरेश मेहता में भी आस्थामूलक वृत्तियों के प्रति आग्रह है। आस्था का पहला रूप पुरोगामी संकल्प का सूचक है।अज्ञेय की कुछ कविताओं में भी आस्था की सफल अभिव्यक्ति हुई है-
मैं आस्था हूं
तो मैं निरंतर उठते रहने की शक्ति हूं

...    ...    ...
जो मेरा कर्म है,उसमें मुझे संशय का नाम नहीं
वह मेरी अपनी सांस-सा पहचाना है
आस्था के दूसरे रूप में सर्जन-शक्ति अथवा कर्म-निष्ठा की भावना रहती है। अन्यत्र अज्ञेय ने आस्था के माध्यम से पूर्णता के उच्चतम धरातल पर प्रतिष्ठित होने की बात का संकेत किया है-
आस्था न कांपे,मानव फिर मिट्टी का भी देवता हो जाता है.
7. वेदना की अनुभूति का प्रयोग: प्रयोगवादी कवि वेदना से पालायन न करके,उसके सान्निध्य की अभिलाषा करते हैं। इसे उसने दो रूपों में स्वीकार किया है-एक तो वेदना को सहन करने की लालसा और दूसरे वेदना या पीड़ा की अतल गहराइयों में बैठ कर नए अर्थ की उपलब्धि के रूप में। भारत भूषण अग्रवाल वेदना को उत्साहवर्धिनी मानते हैं:
पर न हिम्मत हार
प्रज्वलित है प्राण में अब भी व्यथा का दीप
ढाल उसमें शक्ति अपनी
लौ उठा 
मुक्तिबोध की मान्यता है कि वेदना अथवा पीड़ा के अवशेष मानव की संघर्ष-शक्ति को उभारते हैं।

8.समष्टि कल्याण की भावना: इस कविता में व्यष्टि के सुख की अपेक्षा समष्टि के कल्याण को अधिक महत्त्व दिया गया है। रघुवीर सहाय सूर्य से धरती के जीवन को मंगलमय बनाने की प्रार्थना करते हुए कहते हैं:
आओ स्वीकार निमंत्रण यह करो
ताकि, ओ सूर्य,ओ पिता जीवन के
तुम उसे प्यार से वरदान कोई दे जाओ
जिससे भर जाये दूध से पृध्वी का आंचल
जिससे इस दिन उनके पुत्रों के लिए मंगल हो
समष्टि हित के लिए कवि अपने व्यक्तिवाद तथा अहं का विसर्जन करने को भी तत्पर है।अज्ञेय का अकेला मदमाता दीपक अहं का प्रतीक है।उसे वे पंक्ति को समर्पित करने के लिए कहते हैं-
यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता,पर
इसको भी पंक्ति को दे दो
9.वासना की नग्न अभिव्यक्ति:  छायावादी कल्पना में प्रकृति के अनेक रूप-रंगों का चित्रण था,प्रगतिवाद की कविता में सामाजिक यथार्थ की प्रवृति रही तो प्रयोगवादी कविता में फ्रायड के मनोविश्लेषण के प्रभाव से नग्न यथार्थवाद का चित्रण इस कविता में हुआ। इस में साधनात्मक प्रेम का अभाव है मांसल प्रेम एवं दमित वासना की अभिव्यक्ति ही अधिक हुई है। प्रयोगवादी कवि अपनी ईमानदारी अपनी यौनवर्जनाओं के चित्रण में प्रदर्शित करता है। जब वह ऐसा करता है तो सेक्स को समस्त मानव प्रवृत्तियों और प्रेरणाओं का केंद्र-बिंदु मानता है। कुंवरनारायण ने य़ौनाशय को अत्यधिक महत्त्व दिया-
आमाशय
यौनाशय
गर्भाशय
जिसकी जिंदगी का यही आशय
यहीं इतना भोग्य
कितना सुखी है वह
भाग्य उसका ईर्ष्या के योग्य
धर्मवीर भारती ने तो संभोग-दशा का स्पष्ट चित्र ही उतार दिया है-
मैंने कसकर तुम्हें जकड़ लिया है
और जकड़ती जा रही हूंऔर निकट,और निकट
            ...    ...       ...
         और तुम्हारे कंधो पर,बांहों पर,होठों पर
         नागवधू की शुभ्र दंत-पंक्तियों के 
         नीले-नीले चिह्नउभर आये हैं --

इसी प्रकार एक उदाहरण और देखिए--
नंगी धूप,चूमते पुष्ट वक्ष
दूधिया बांहें रसती केसर-फूल
चौड़े कर्पूरी कूल्हों से दबती
सोफे की एसवर्गी चादर
रेशम जांघों से उकसीं
टांगों की चंदन डालें
10.क्षण की अनुभुति: प्रयोगवादी कविता में क्षण विशेष की अनुभूति को यथारूप प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति है। इस युग का कवि क्षण में ही संपूर्णता के दर्शन करता है-
एक क्षण: क्षण में प्रवाहमान
व्याप्त संपूर्णता
इस से कदापि बड़ा नहीं था महबुधि जो--
पिया था अगस्त्य ने। 
जीवन के ये क्षण सुख-दुख,संयोग-वियोग,आशा-निराशा किसी भी रूप में हो सकते हैं। इस लिए इस कविता में विविधता व विरोधी प्रवृत्तियां एक साथ समाविष्ट हो गई हैं। धर्मवीर भारती की कविता में विरोधी अनुभूतियों का(आध्यात्मिक एवं भौतिक)सुंदर समन्वय हुआ है।

फूल झर गए
क्षण भर की ही तो देरी थी
अभी अभी तो दृष्टि फेरी थी
इतने में सौरभ के प्राण हर गए
फूल झर गए
10. भदेसपन : प्रयोगवादी कवियों ने प्रयोग की लालसा में उन सभी कुरुचियों,विकृतियों तथा भद्दे दृश्यों को भी कविता में चित्रित किया है जो जीवन और समाज में व्याप्त रहें हैं,लेकिन उपेक्षित। इन्हें चित्रित करने के पीछे प्रयोगवादी कवियों का तर्क है कि जीवन में सभी कुछ सुंदर नहीं होता,बल्कि असुंदर और घृणित वस्तु तथा दृश्य भी जीवन से जुड़े रहते हैं। इसलिए जीवन की पूर्णता में ये त्याज्य नहीं हैं और घिनौनी चीजों में सौंदर्य देखने के लिए विशेष साधना अपेक्षित है। इससे कविता में जुगुप्सा उत्पन्न होती है। अज्ञेय की कविता का एक उदाहरण देखिए-
निकटतर धंसती हुई छत,आड़ में निर्वेद
मूत्र-सिंचित मृत्तिका के वृत्त में
तीन टांगों पर खड़ा नत ग्रीव
धैर्य,धन,गदहा 
11. व्यंग्य :व्यंग्य का गहरा पुट इस कविता की विशेषता रही है। आधुनिक जीवन की विसंगतियों पर,लोगों के बदलते हुए रूपों पर,सभ्यता के नाम पर फैले शोषण पर,राजनीति की कुटिल चालों पर,धर्म के व्यापारों पर,यह कविता व्यंग्य करती है। आज के जीवन का खोखलापन,स्वार्थपरता का भाव कवि के मन को खीझ से भर देता है। इसलिए वह इन पर गहरा व्यंग्य करता है। अज्ञेय की कविता सांप में शहरी सभ्यता पर करारा व्यंग्य है--
सांप तुम सभ्य ति हुए नहीं,न होगे,
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछूं! उत्तर दोगे!
फिर कैसे सीखा डसना
विष कहां पाया।  
12.काव्य शिल्प में नए प्रयोग:  शिल्प के क्षेत्र में प्रयोगवादी कवियों के काव्य में अपूर्व क्रांति दिखाई पड़ती है। मुक्तिबोध के काव्य में वक्रता से सरलता की ओर जाने की प्रवृत्ति संकेतों के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। गिरिजाकुमार माथुर ने काव्य में विषय की अपेक्षा टेकनिक पर अधिक ध्यान दिया। भाषा,ध्वनि तथा छंद-विधान में उन्होंने नवीन प्रयोग किए। प्रभाकर माचवे ने नई अलंकार- योजना,बिम्ब-विधान और उपमानों के नए प्रयोग किए। अज्ञेय ने साधारणीकरण की दृष्टि से भाषा संबंधी नवीनता को अधिक महत्त्व दिया। शमशेरबहादुर सिंह ने फ्रांसीसी प्रतीकवादी कवियों के प्रभाव में पर्याप्त प्रयोग किए,जिनके कारण उन्हें कवियों का कवि कहा जाने लगा। स्पष्ट है कि प्रयोगवादी कवियों ने भाषा,लय,शब्द,बिम्ब तथा छंद-विधान संबंधी नए प्रयोगों पर बहुत ध्यान दिया।

13. बिम्ब योजना: प्रयोगवादी कविता में बिम्ब-योजना बड़ी सफलता के साथ की गई है। इस कविता से पूर्व की किसी कविता में इतने अधिक स्पष्ट बिम्ब उतरें हैं,इसमें संदेह है। बिम्ब योजना के विषय में प्रयोगवादियों की बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इनके बिम्ब नितान्त सजीव हैं। प्राकृतिक-बिम्बों का एक उदाहरण द्रष्टव्य है:-
बूंद टपकी एक नभ से
किसी ने झुककर झरोखे से
कि जैसे हंस दिया हो
यहां बूंद टपकने और झरोखे से झांककर हंसने में सादृश्य दिखाया गया है।झरोखे से हँसी देखने के लिए निगाह ऊपर उठती है और टपकती बूंद भी आकाश की ओर बरबस नेत्रों को खींच लेती है। इस बिम्ब में अनुभूति की सूक्ष्मता तथा गहराई दर्शनीय है।

14.नए उपमान : अप्रस्तुत-योजना में प्रयोगवादी कवियों ने पुराने उपमानों का पूर्णत: परित्याग कर दिया है। इनके उपमान एकदम नए हैं। इनके अप्रस्तुत-विधान की प्रमुख विशेषता यह है कि वे जीवन से गृहीत हैं,उनकी संयोजना के लिए कल्पना के पंखों पर नहीं उड़ा गया है। उदाहरण के लिए प्रभाकर माचवे की ये दो पंक्तियां देखिए-
नोन-तेल लकड़ी की फिक्र में लगे घुन से
मकड़ी के जाले से,कोल्हू के बैल से ।
उपमान की नवीनता मुक्तिबोध की इन पंक्तियों में भी देखते ही बनती है,जिनमें उन्होंने नेत्रों के लिए लालटेन और पांवों के लिए स्तम्भ के उपमानों को चुना है-
अंतर्मनुष्य
रिक्त सा गेह
दो लालटेन से नयन
निष्प्राण स्तम्भ
दो खड़े पांव  
कुछ और उदाहरण देखिए-
प्यार का नाम लेते ही
 बिजली के स्टोव सी
 जो एकदम सुर्ख हो जाती है  
X   X   X    X   X   X    X
आपरेशन थियेटर सी
जो हर काम करते हुए चुप है 
15.  असंगत अनुषंग का प्रयोग : इलियट के काव्य-स्वरूप प्रयोगवादी कवियों में असंगत अनुषंगो(फ्री एशोसिएशंस) की भरमार मिलती है,जिससे इनका काव्य अत्यधिक दुरुह हो गया है। जहां पर ये कवि असंगत अनुषंगों का प्रयोग करने लग जाते हैं,वहां पर इनकी विचारधारा में पूर्वापर का संबंध न होने के कारण किसी एक निश्चित अर्थ पर पहुंचना मुश्किल हो जाता है। प्रयोगवादी कविता में सर्वप्रथम इस प्रवृत्ति का अवतरण अज्ञेय ने किया उसके बाद इसका बहुत अधिक प्रयोग होने लगा। असंगत अनुषंग अथवा असंबद्धता के लिए यहा नरेश की कुछ पंक्तियां उद्धृत हैं--
ई से ईश्वर
उ से उल्लू--
मां जी ?
नहीं जी 
वह पंछी
जो देखता है रात भर 
प्रस्तुत पंक्तियों का वड़ी माथा-पच्ची करने पर ही यह अर्थ निकाला जा सकता है कि कवि किसी कार्य में व्यस्त है कि इतने में उसका बच्चा ई से ईश्वर,उ से उल्लू रटता हुआ उसके पास आता है और सहसा कवि से अपनी मां जी के विषय में प्रश्न करता है। कवि संभवत: यह समझता है कि लड़का कदाचित यह पूछना चाहता है कि क्या मां उल्लू हैं? कवि प्रश्न को जैसा समझता है,उसके अनुसार उत्तर देता हुआ कहता है कि नहीं मां जी उल्लू नहीं हैं। उल्लू तो एक पक्षी है जो रात भर देखता है। स्पष्टत: असंगत अनुषंग प्रयोगवादी कविता को समझने में बड़ी बाधा उत्पन्न करते हैं। इसमें साधारणीकरण का सर्वधा अभाव है।

16. नवीन शब्द-चयन :एक ओर शब्द चयन में प्रयोगवादी कवि बहुत उदारता के साथ ग्रामीण,देशज तथा प्रचलित शब्दों को अपनाता है वहीं दूसरी ओर संस्कृत और अंग्रेजी का व्यापक प्रयोग भी करता है। व्याकरण के नियमों से चिपक कर रहना भी उसे सह्य नहीं। अत: भाषा के एक नए ढ़ग का नयापन आ गया है। इसमें नए क्रियापद भी बनते हैं। नए शब्दों में बतियाना,लम्बायित,बिलमान,अस्मिता,ईप्सा,क्लिन्त,इयत्ता,पारमिता आदि। इस प्रकार शब्दों को तोड़ा मरोड़ा गया है। इसके अलवा इन कवियों ने विज्ञान,दर्शन,मनोविज्ञान से भी शब्द ग्रहण किए हैं।

17. नवीन-प्रतीक : आज के जीवन और जगत के साथ-साथ आम आदमी को,वैज्ञानिक क्रियाओं को,शब्दों और प्रभावों को प्रयोगवादी कविता में स्थान दिया गया है। मनोविज्ञान से भी प्रतीक चुने गए हैं। कवियों ने सर्वथा पुराने प्रतीकों को त्याग कर नवीन प्रतीकों को ग्रहण किया है। मुक्तिबोध के प्रतीकों में ब्रह्मराक्षक,ओरांग-उटांग,गांधी,सुभाष,तिलक,रावण,वटवृक्ष आदि प्रसिद्ध प्रतीक हैं। नए प्रतीक जैसे प्यार का बल्ब फ्यूज हो गया, भी देखे जाते हैं।

18.छंद-विधान : प्रयोगवादियों ने छंद-विधान में तो आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया है। यहां विभिन्न तरह के प्रयोग हुए हैं। छंदों के परम्परागत मात्रिक रूपों से उसका कोई संबंध नहीं रह गया है। इससे कविता में कभी लय और गति का अभाव उत्पन्न होता है और कभी उसमें काव्यात्मकता के स्थान पर गद्यात्मकता आ जाती है। एक ओर लोकगीतों की धुनों के आधार पर कविताओं की रचना हुई है वहीं दूसरी ओर उर्दू की रूबाइयों और गज़लों का प्रभाव भी कविता पर पड़ा है। अंग्रेजी के सॉनेट से मिलती-जुलती कविता भी इन कवियों ने लिखी। यह छंदहीन कविता मुक्तक छंद को अपनाती है।
भारत भूषण अग्रवाल की कविता का एक उदाहरण,जिसमें काव्य गद्यात्मक हो गया है:-
तुम अमीर थी
इसलिए हमारी शादी न हो सकी
पर मान लो,तुम गरीब होती--
तो भी क्या फर्क पड़ता
क्योंकि तब
मैं अमीर होता

अज्ञेय की एक कविता का अंश जिसमें लोक-गीत के आधार पर सरल काव्य रचना की गई है-
मेरा जिया हरसा
जो पिया,पानी बरसा
खड़-खड़ कर उठे पात
फड़क उठे गात 

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्येक क्षेत्र में नवीनता का आग्रह प्रयोगवाद की उपलब्धि है। इसी के चलते कहीं-कहीं यह कविता दुरुह भी हो गई है। इसके लिए डॉ. नगेन्द्र ने पांच कारणों को प्रमुख माना-1. भावतत्त्व और काव्यानुभूति के मध्य रागात्मक के स्थान पर बुद्धिगत संबंध 2. साधारणीकरण का त्याग 3. उपचेतन मन के खंड अनुभवों का यथावत चित्रण 4. भाषा का एकांत एवं अनर्गल प्रयोग तथा 5. नूतनता का सर्वग्राही मोह।
-0-

टिप्पणियाँ

  1. प्रयोगवाद की प्रवृत्तियो के बारे में पढ़ कर अच्छा लगा .हिन्दी साहित्य के भिन्न भिन्न वादों के बारे में आप बताते रहेंगे तो इसी तरह ज्ञान प्राप्त हो जाएगा

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  2. अद्भुत!
    इस पर कोई कमेंट देने का अधिकारी नहीं समझता खुद को। बस ज्ञान लाभ कर रहा हूं।

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  3. बहुत गहराई से विवेचन किया है आपने। बधाई।

    ............
    International Bloggers Conference!

    उत्तर देंहटाएं
  4. हिन्दी कविता के इतिहास को आप गहरे अवलोकन के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं ।आभार । प्रयोगवाद का आपने बहुत सही विश्लेषण किया है । नए बिम्ब ,प्रतीकों व उपमानों का प्रयोग ही इस काल को विशिष्ट बनाता है । जब अज्ञेय जी ने नायिका को कमल चाँद या गुलाब न कह कर बाजरे की कलगी और ललाते नभ की तारिका कहा तो सचमुच ही जैसे नया युग प्रारंभ होगया ।

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  5. आधुनिक हिंदी कविता में प्रयोगवाद का दौर काफी महत्वपूर्ण है। जहाँ से एक तरफ नई कविता अपना स्वरुप गढती है तो दूसरी तरफ यथार्थ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट करने की कोशिश दिखती है। ये लेख काफी महत्वपूर्ण है।

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  6. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 28 अक्टूबर 2017 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  7. आदरणीय आपकी एक -एक पंक्तियाँ लाज़वाब हैं बहुत सुन्दर

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